Wednesday, January 22, 2020

भारतीय दर्शन का इतिहास और काल विभाजन


पाश्चत्य परम्परा में दार्शनिक चिंतन का प्रारम्भ थेलस से माना जाता है। थेलस से लेकर आजतक पश्चिमी दार्शनिक परम्परा के इतिहास को प्री सौक्रेटिक, सौक्रेटिक, मध्यकाल, आधुनिककाल और समकालीन दार्शनिक प्रवृति में विभाजित किया जाता है। भारतीय परंपरा में इस प्रकार का विभाजन कठिन है जिसका कारण यह है कि यहाँ पश्चिम की तरह दार्शनिक परम्पराएं किसी काल विशेष में ही प्रभावी नही रही साथ ही पश्चिम की भांति किसी दर्शन विशेष का यहाँ कोई खास युग नही रहा। जोनार्डन गनेरी के अनुसार शास्त्रीय भारतीय दर्शन की बात करना बेमानी है और इसका कारण है भारतीय दर्शनिक परम्पराओ की सातत्यता और जीवंतता।¶ वेदों-उपनिषदों के अतिप्राचीन सिद्धान्त आज भी भारतीय जनमानस के व्यवहार में जीवंत हैं।
भारतीय दर्शन के इतिहास को राधाकृष्णन वैदिक काल, महाकाव्य काल, सूत्र काल तथा टीका काल मे विभाजित करते हैं:
■वैदिक काल: 1500 ई● पू● से 600 ई● पू●
■महाकाव्य काल: 600 ई● पू● से 200 ई● पश्चात
■ सूत्रकाल एवम टीकाकाल: 200 ई● के पश्चात

प्रो● हिरियन्ना ने इसे वैदिक युग, प्रारम्भिक वेदोत्तर युग तथा दर्शनों के युग मे विभाजित किया है।
■ वैदिक युग: उपनिषद पूर्व विचारधारा तथा उपनिषद
■ प्रारम्भिक वेदोत्तर युग: भगवतगीता, प्रारम्भिक बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म
■ दर्शनों का युग: भौतिकवाद, उत्तरकालीन बौद्ध सम्प्रदाय, न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग, पूर्वमीमांसा-उत्तरमीमांसा

उपरोक्त विद्वानों के अलावा जोनार्डन गनेरी ने भी एक  विभाजन किया है:
■जीवन पद्धति के रूप में दर्शन: 800 ई● पू से 200 ए● डी: इस काल मे वेद, उपनिषद, गीता, प्रारम्भिक बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म आजाते हैं। इस काल की प्रवृति विमर्शात्मक चितन, विविध परिकल्पनाएं और दर्शन के माध्ययम से उच्चतम आदर्श और जीवन का खोज करते हुए दुःखो का शमन था।
■ सूत्रों का काल: 100 ई● पू● से 350 ए● डी● जीवन मार्ग के रूप में दर्शन के पश्चात सूत्रों का काल आता है। यहाँ भी हालांकि दर्शन का वह प्रारम्भिक उद्देश्य बना रहता है किंतु दर्शन अब अनवीक्षकी बन जाती है और फोकस उक्त लक्ष्य के बावजूद आत्मा के अलावा प्रमाण और प्रमेय पर केंद्रित हो जाता है। भावत्वमकता का स्थान तर्कशीलता ले लेती है।
यही काल है जब बौद्ध और जैन दार्शनिक विमर्श पाली और प्राकृतिक से हटकर संस्कृत भाषा मे किए जाते हैं।
यह काल दर्शन के लिहाज से बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इस काल मे विविध परम्पराओं ने आपस मे संवाद और विमर्श स्थापित किया।
■ 150 ए● डी से 550 ए●डी● के काल को गनेरी बौद्ध विश्लेषण और जैन संश्लेषण का काल कहते हैं।

इसके पश्चात बौद्ध धर्म और दर्शन की अवनति के कारण इस उत्प्रेरक के अभाव में भारतीय दार्शनिक सम्प्रदाय शिथिल से पड़ते हैं।

नौंवी शताब्दी से 13वी 14वी शताब्दी का काल गनेरी के अनुसार भारतीय दर्शन के व्याकुलता का काल है। इस काल मे दार्शनिक इस्लाम की उपस्थिति के कारण कुछ नए की बजाय पुराने दार्शनिक सिद्धान्तो की ओर लौटते नज़र आते हैं और इसके बाद उपनिवेश काल मे दर्शन तत्वमीमांसा और ज्ञानमीमांसा से हटकर समाज और राजनैतिक दर्शन की ओर अपना रुख करती है।
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¶ भारतवर्ष में कुछेक दार्शनिक मतवादों का जन्म बहुत पुराने समय मे ही हो गया था, और आगे के समय का दार्शनिक क्रियाकलाप-कम से कम इरादे में-इन मूलभूत दृष्टिभंगियो का पल्लवन-भर था। 
(चट्टोपाध्याय)

【यह शोध का विषय हो सकता है कि भारत में दार्शनिक क्रियाकलाप एक सर्वथा नवीन वैचारिक ढांचे में नवीन चिंतन, जगत और मनुष्य तथा जगत और मनुष्य के नए नए सम्बन्धो की तलाश की बजाय पूर्व में प्रतिपादित कुछ मूलभूत दृष्टि और स्थापित वैचारिक ढाँचे का ही बार बार नवीन हामी ही क्यों रहा।
दर्शन मनुष्य से बड़ा नही है किंतु भारत मे इस दृष्टि का जन्म क्यो नही हो पाया जिसमे मनुष्य के अस्तिव को दर्शन के ऊपर स्थापित किया जाय। 
विचारों में परिवर्तन, वैचारिक ढाँचों में परिवर्तन बदलती परिस्थितियों के सूचक होते हैं। भारत मे एक ही वैचारिक ढाँचे और फिर मात्र बौद्ध धारा में एक नवीन वैचारिक फ्रेमवर्क का आना क्या इस बात की ओर ईशारा नही करता कि भारतीय समाज पश्चिमी समाज की तुलना में गत्यात्मक नही था?
राजनैतिक उठापठक, साम्राज्यों का आना और जाना अलग बात है और सामाजिक गत्यात्मकता और बात।】

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